11 हज़ार लड़ाकों के बराबर था ये अकेला ‘सिपाही’ कोई भी फ़ौज नही हरा सकी थी इसको, जिसकी टुकड़ी में ये शामिल होता

इस्लामिक किस्सों की सीरीज में हम आपके लिए आज लेकर आए हैं ऐसे जंगी बहादुर की दास्तान, जिस टुकड़ी में ये शामिल हो जाता तो मानो कि दुश्मनों की रूह कांप जाती थी| उसको देख कर ही दुश्मन के हाथ पैर कांप उठते और उसके डर के मारे तलवार उनके हाथ से छूट कर नीचे गिर जाती थी| ये बहादुर जंग के मैदान में अकेला 10-20 नहीं वाल्की बल्कि पूरे 11000 लड़ाकों की फौज के बराबर अकेला उनसे लड़ने की ताकत रखता था| इस्लाम का सच्चा सिपाही था जिसका नाम इस्लामी तारीखों में सुनहरे हर्फों से लिखा गया|

Jungi

सदियों बाद भी आज जंग के किस्सों में इसको याद किया जाता है

जंग-ए-यमामा का किस्सा तो आपने सूना ही होगा, अगर आप इसके बारे में नहीं जानते तो यहाँ इस लिंक पर क्लिक करके आप जंग-ए-यमामा का किस्सा भी पद सकते हैं| तो शुरू करते हैं उस वक़्त से जब जंग-ए-यमामा की अजीमोशान जीत से फ़ुर्सत पा कर ख़ालिद बिन वालिद (रज़ी0) ने अपने साथियों में ख़लीफ़ा अबू-बकर रज़ी0 के फ़ैसले का एलान किया कि अब जो भी लोग अपने घर जाना चाहते हैं वो जा सकते हैं| आपको बता दें कि ख़ालिद बिन वालिद की टुकड़ी में उस वक़्त लगभग 13000 सिपाही मतलब की लड़ाके थे|

jung e yamama

अब आप ये जान लें कि इस एलान को करने के बाद 11000 सिपाही वापस अपने-अपने घर को चल दिए| क्योंकी ये जंग बहुत लम्बे वक़्त से लड़ी जा रही थी, और जीत हासिल करने के बाद संको खुशी भी थी| और फिर ऐसे में कुछ आराम और अपने परिवार के साथ वक़्त बिताना हर कोई चाहता है| तो अब ख़ालिद रज़ी0 के पास सिर्फ़ 2000 सिपाहीयों की फौज ही बची थी जो उनके पास थी|

Jung E Khaibar

लेकिन एक बात और यहाँ इन लोगों से बहुत बड़ी चूक हो चुकी थी कि किसी भी जंगी महाज़ से इतनी बड़ी तादाद में सिपाहीयों का चला जाना बड़ा ख़तरा बन सकता था, और इस बात को देखते हुए हज़रत ख़ालिद ने मदीना हज़रत अबूबकर रज़ी0 से मदद तलब की|

The Camel

इसके बाद फिर हज़रत अबू बकर ने एक नौजवान को बुलाया और उनसे कहा के ख़ालिद को रसद की ज़रूरत है, इसीलिए आपको वहां जाना है| और वहाँ मौजूद लोग हैरत से ख़लीफ़ा की तरफ़ देखने लगे की जिस महाज़ से 11000 सिपाही घर को चले गए हों वहाँ उनके बदले में सिर्फ़ एक नौजवान को भेजा जा रहा है|

uhud diyush 273465

तब अबू बकर रज़ी0 ने उस नौजवान की तरफ़ देखा और कहा “कोई भी फ़ौज नही हार सकती जिसकी टुकड़ी में ये बहादुर नौजवान मौजूद हो| उस One man Army का नाम “क़ा’क़ा बिन अम्र अल-तमिमि” था। एक बार रसूलल्लाह सल्लहू अलह वसल्लम ने हज़रत क़ा’क़ा से पूछा क़ा’क़ा हमें ये बताओ कि तुमने जंग की कुछ तैय्यारी कर राखी है क्या?

हज़रत की बात सुन क़ा’क़ा ने जवाब दिया अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म और साथ में मेरा घोड़ा बस इतना ही काफी है किसी भी फौज को घुटनों के बल टिकाने के लिए| आप हज़रत सल्लाहू अलह वसल्लम ने फ़रमाया, यही मक़सद है और फिर अल्लाह के रसूल ने जोर से पुकारना शुरू किया “सैफुन ली क़ा’क़ा” इसका मतलब क़ा’क़ा के लिए एक तलवार लेकर आओ| क़ा’क़ा बिन अम्र अल-तमिमि की बहादुरी के ऐसे ऐसे कारनामे हैं कि आप सोचने पे मजबूर हो जाएँगे कि क्या कोई इंसान बहादुरी के इस मुकाम तक पहुँच सकता है|

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *