25 साल से आ$तंकी होने के आ’रोप में मुस्लिम समुदाय के 11 लोगो को किया बरी

अयोध्या में स्थिति बाबरी मस्जिद के ढां’चे को गिराए जाने के बाद बदले की साज़िश रचने और आतं$की प्रशिक्षण हासिल करने के लिए 25 साल पहले टाडा कानून के तहत गिरफ़्तार किए गए 11 लोगों को बरी कर दिया गया है. महाराष्ट्र के नासिक की एक विशेष टाडा अदालत ने आतं$कवाद से जुड़े 25 साल पुराने इस मामले में मुस्लिम समुदाय के 11 लोगों को सबूतों के अभाव के चलते बरी कर दिया है. खबरों के अनुसार इन लोगों को 28 मई 1994 को देश के अलग-अलग हिस्सों से आतं$कवाद के आ’रोप में गि’रफ्तार किया गया था.

उर्दू वेबसाइट द सियासत डेली के अनुसार विशेष टाडा अदालत के जस्टिस एससी खाती ने मामले की सुनवाई के बाद सबूतों के अभाव और टाडा यानी आतं$कवादी और विघटनकारी क्रियाकलाप (नि’रो’धक) अधिनियम के दिशानिर्देशों के उल्लं’घन का हवाला देते हुए इन लोगों को बीते 27 फरवरी को बरी करने का फैसला सुनाया.

इन लोगों पर यह आ’रोप भी लगाए गए थे कि ये लोग महाराष्ट्र के नासिक और भुसावल शहरों से अपने क’थित आतं$की सं’ग’ठन भुसावल-अल-जिहाद के लिए युवाओं की भ’र्ती करने का प्रायस कर रहे थे लेकिन यह आरोप साबित नहीं हो सके. सभी आरोप बेबुनियाद और झूठे पाए गए.

अदालत द्वारा बरी किये गए यह लोग जमील अहमद अब्दुल्ला ख़ान मोहम्मद यूनुस मोहम्मद इशाक़ फ़ारूक़ नज़ीर ख़ान यूसुफ़ गुलाब ख़ान अयूब इस्माइल ख़ान वसीमुद्दीन शम्सुद्दीन शेख़ा शफ़ी शेख़ अज़ीज़ अशफ़ाक़ सैयद मुर्तुज़ा मीर मुमताज़ सैयद मुर्तुज़ा मीर हारून मोहम्मद बफ़ाती और मौलाना अब्दुल कादेर हबीबी है.

बता दें कि एनजीओ जमीयत उलेमा ने इन 11 लोगों को कानूनी सहायता प्रदान की थी. वहीं द सियासत डेली के अनुसार इन 11 लोगों को 28 मई 1994 को गिरफ्तार किया गया था और इन लोगों पर आईपीसी की धारा 120 (बी) और 153 और टाडा अधिनियम की धारा 3 (3) (4) (5) और धारा 4 (1) (4) के तहत दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने का बदला लेने और आ$तंकी प्रशिक्षण हासिल करने के आरोप लगाए गए थे.

हिंदुस्तान टाइम्स की जुलाई 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार इन 11 आरोपियों में एक डॉक्टर और एक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर भी शामिल है. इसके साथ ही इन लोगों पर महाराष्ट्र के भूसावल के एक रेलवे स्टेशन और बिजली संयंत्र पर बम रखने की साजिश रचने का आरोप भी लगाया गया था.

मई 1994 में हिरासत में लेने के बाद आरोपियों को कुछ महीनों के भीतर जमानत मिल गई. लेकिन आरोपियों के खिलाफ टाडा लगाए जाने के चलते संदेह की वजह से मामला काफी सालों से अटक रहा. सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2016 में हस्तक्षेप करते हुए मामले की सुनवाई को तेज़ करने का आदेश दिया.

जमीयत उलेमा की लीगल सेल के प्रमुख गुलज़ार आज़मी ने कहा कि न्याय मिला लेकिन इन लोगों ने अपने जीवन के बेशकीमती साल खो दिए. इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सरकार इसकी भरपाई कर सकती है और इनका सम्मान लौटाएगी? इनके परिवारवालों ने बहुत कुछ सहा है जबकि इनमें से कुछ लोगों के परिवारवालों का इंतकाल तक हो गया है.