मेरी जन्नत मेरे कश्‍मीर को कब्र‍िस्‍तान मत बनाओ- मोहम्मद यूसुफ

नई दिल्लीः केन्द्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) से विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को हटाने और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने के बाद केंद्र सरकार लगातार दोनों प्रदेशों की स्थिति सामान्य करने की कोशिश में जुटी है। लेकिन अभी जम्मू कश्मीर के मौजूदा हालात क्या हैं इस पर कश्मीर विधानसभा में चार बार विधायक रहे मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने एक अंग्रेजी अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड से खास बातचीत की है।

सवाल नम्बर एक: क्या जमीनी स्तर पर जम्मू-कश्मीर में हालात ठीक हैं?

जवाब में मोहम्मद यूसुफ ने कहा की स्थिति बहुत ही दर्दना’क है। खास कर उन लोगों के लिए है जिन्होंने पहले इसका अनुभव नहीं किया। यह कश्मीरियों के लिए एक भया’नक समय जिनको अपने ही घर में जेल बनाकर कैद कर दिया है। यह हमारे देश के भविष्य, इसकी विनम्रता और चरित्र पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटीज खुले हैं लेकिन न तो वहां पड़ने वाले है और न ही पढ़ाने वाले हैं।

यूसुफ ने कहा की इससे पहले भी हमने जम्मू कश्मीर में कई उथल-पुथल देखी है। यहाँ पिछले करीब तीस सालों से खू’न खरा’बा हो रहा है। कभी भी हिं’सा हो जाती है। खासकर वो लोग जो देश की एकता के लिए खड़े रहे, बलिदान दिया, अपने सी’ने पर गो’लि’यों खाई और आज वही लोग खुद को धोखा खाया हुआ महसूस कर रहे हैं। यहां आगे और ख’तरा है। और इस पर अभी ध्यान देने की बहुत जरुरत है।

सवाल नम्बर दो: क्या कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन में कमी सामान्य स्थिति का संकेत नहीं है?

जवाब: आप ने सेंट्रल जेल, तिहाड़ जेल में कितनी बार प्रदर्शन देखें हैं? नहीं देखा न लेकिन कश्मीर आइए और खुद देख लीजिए यहाँ ये हर रोज़ की कहानी है लेकिन मैं कोई कहानियां नहीं बना रहा, मैं एक जम्मू कश्मीर का जिम्मेदार नागरिक हूं और बोलना मेरा हक़ है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत सरकार को जवाबदेह बनाना है। मगर हमारे मामले में है।

केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को बिना किसी कश्मीरी की राय को जाने वगैर मनमाने ढंग से निरस्त कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर में संविधान को नष्ट कर दिया गया। राज्य स्वंय दो शाखाओं में बंटा है मगर उनका दावा है कि वो जम्मू-कश्मीर के लोगों को देश के बाकी हिस्सों के साथ जोड़ रहे हैं। क्या यही एकीकरण है?

मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने कहा की जब मैं कश्मीर लौटता हूं तब मुझे अपने भाग्य का पता नहीं होता। लेकिन मेरे कई साथी या तो हाउस अरेस्ट हैं यहां नजरबं’दी कैंपों में हैं। जम्मू कश्मीर का नोजवान युवा जेलों में स’ड़ रहे हैं, उनके परिजनों का कोई अत पता नहीं की उनकी न ही परिजनों को औलादो का पता की वो कहा हैं।

भारत के संविधान के कम से कम मौलिक अधिकारों को तो जम्मू-कश्मीर में काम करना चाहिए था। क्या मुझे अपनी पीड़ा व्यक्त करने की भी स्वतंत्रता नहीं है? अपनी नजरबंदी के कारण मुझे जानने का हक नहीं? मगर भारत का संविधान जम्मू-कश्मीर में अस्तित्वहीन है।

 साभार: जनसत्ता