असम के बाद अब इस बड़े राज्य में उठी NRC ला’गु करने की मांग

जैसा की हम जानते हैं कि बीते कुछ दिनों पहले असम में NRC को ग्रह मंत्री अमित शाह निरिक्ष’ण में करवाया गया जिसकी फाइनल लिस्ट के बाद लगभग 19 लाख लोग अपना स्थान लिस्ट में नहीं बना पाए थे| कई लोग जो वहाँ के नागरिक हैं उन्ही के नाम इस लिस्ट में मौजूद नहीं हुए| कई लोग तो ऐसे भी मौजूद हैं जो देश के बड़े बड़े पदों पर नियु’क्त है लेकिन NRC में उनका नाम नहीं| ऐसे ही एक और बड़े राज्य में NRC के लागू करने की मांग कि गयी है| बता दें कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने मांग की है कि उनके राज्य में भी असम की तर्ज पर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की कवाय’द की जाए।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्ट’र ने एक साक्षात्का’र में कहा कि इससे देश के नागरिकों और अवै’ध प्रवासि’यों में फर्क पता चल सकेगा। डेली न्यूज़ पर छपी खबर के मुताबिक़ मनोहर लाल खट्ट’र ने कहा कि मौजूदा हालात में इसकी काफी जरूरत है। हरियाणा में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं।

आपको बता दें कि असम में 3.30 करोड़ आवेदकों में से 3.11 करोड़ लोगों को जगह मिली है यानी 19 लाख लोग इस सूची से बाहर हो चुके हैं। इससे पहले मसौदा एनआरसी की सूची जारी हुई थी जिसमे करीब 41 लाख लोगों का नाम शामिल नहीं था। जो लोग एनआरसी की इस लिस्ट में अपना नाम दर्ज नहीं नहीं करवा पाए थे 30 जुलाई 2018 को ऐसे लोगों का अधिकारियों ने बा’योमैट्रि’क डेटा लिया जिन्होंने भारतीय नागरिकता का दावा किया था।

अधिकारियों द्वारा लिए गए इस बायोमीट्रि’क डेटा की वजह से अब लोगों का आधार कार्ड बनाना संभव हो सकेगा। राष्ट्रीय नागरिकता पं’जी NRC में अंतिम रूप से अपना नाम नहीं जुड़’वा पाने वाले लोग अगर कानूनी प्रक्रिया के बाद भी अपनी भारतीय नागरिकता सि’द्ध नहीं कर पाते हैं तो वे देश में कहीं से भी अपना आधार कार्ड नहीं बनवा सकेंगे, क्योंकि उनके बायोमीट्रि’क्स के आगे निशान बना दिया जायेगा।

गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि, एनआरसी दावों की प्रक्रिया के दौरान लिए गए बायोमीट्रि’क डेटा यह सुनिश्चि’त करेंगे कि जिन लोगों ने अंतिम एनआरसी में जगह बना ली है वे आधार पाएं और जो अपनी भारतीय नागरिक’ता सि’द्ध नहीं कर सके वे देश में कहीं इसे न बनवा पाएं।

जानकारी के लिए आपको बता दें कि पहला NRC रजिस्टर 1951 में जारी हुआ था। ये रजिस्टर असम का निवासी होने का सर्टिफि’केट है। इस मुद्दे पर असम में कई बड़े और हिंसक आंदोलन भी हुए हैं। 1947 में बंटवा’रे के बाद असम के लोगों का पूर्वी पाकिस्तान में आना जाना जारी रहा।

बता दें कि 1979 में असम में घु’सपैठि’यों के खिला’फ ऑल असम स्टूडेंट्स’ यूनि’यन ने आंदोलन किया था| इसके बाद 1985 को तब की केंद्र में राजीव गांधी सरकार ने असम ग’ण परिष’द से समझौता किया था जिसके तहत 1971 से पहले जो भी बांग्लादे’शी अस’म में घु’से हैं उन्हें भारत की नागरिक’ता दी जाएगी।