भारतीय मुसलमान अपने वतन से बहुत मोहब्बत करता है, जो इस पर सवाल उठाता हैं, वो…

वतन की आज़ादी के बाद जब चुनाव होने थे तो पंडित नेहरू ने मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद से कहा कि हम आपको रामपुर लोकसभा सीट से खड़ा कर रहे हैं. इस पर मौलाना ने पूछा कि रामपुर से क्यों? नेहरू ने कहा कि क्योंकि वो मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. जिस पर मौलाना ने कहा कि मैं वहां से खड़ा होना पसंद नहीं करूंगा. मैं हिंदुस्तान का नेता हूं मुसलमानों का नेता नहीं हूं.

इसके बाद वह गुड़गांव, पंजाब से लड़े और जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे. अब यह तो नहीं कहा जा सकता कि बीजेपी लोकसभा या फिर विधानसभा चुनाव में मुस्लिमों को टिकट क्यों नहीं देती हैं? उन्होंने नहीं दिया या हो सकता है कोई मांगने ही ना गया हो.

लेकिन अब अगर वो सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास नारे का सपना सही में देखना चाहते थे तो ये होना चाहिए था कि पांच ऐसी सीटों से जो अल्पसंख्यक बहुल ना हो, वहां से पांच मुसलमानों को जितवा कर सदन में लेकर आते तो यूपी ही नहीं बल्कि पुरे देश में उनकी इज़्ज़त बढ़ती.

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इसके साथ यह संदेश मजबूती के साथ जाता कि पार्टी वाकई सबका विकास चाहती है. पार्टी की ग़लती मुसलमानों को टिकट देना नहीं है बल्कि उसकी ग़लती ये है कि उसे कुछ ऐसे उम्मीदवार जितवाने चाहिए थे जो मुसलमान होते लेकिन मुस्लिम बहुल सीट की बजाए ऐसी सीट से जीत दर्ज करते जहां हिंदू या दूसरी क़ौमें रहती हैं.

बीजेपी एक तरफ कहती है कि मुसलमानों का तुष्टीकरण हो रहा है तो दूसरी तरफ़ वह खुद मुसलमानों से दूरी बनाकर चलती है ऐसे में अगर आप मुसलमानों को साथ लेंगे ही नहीं तो कैसे मुसलमान आपके साथ आएंगे? मैंने साहित्य अकादमी अवार्ड लौटाया तो बार-बार कहा गया कि मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इसको आप कहां फेंकेंगे?

समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका एक ही हल है कि इनको आप सीने से लगाए. मैं दुश्मन ही सही आवाज़ दे मुझको मुहब्बत से, सलीक़े से बिठाकर देख हड्डी बैठ जाती है.

बीजेपी मुसलमानों को कुछ सीटों पर प्रतिनिधित्व देकर यह सुनिश्चित कर सकती थी कि उसके प्रति जैसा सोचा जाता है वह वैसी नहीं है. एक पार्टी जो सत्ता में है उसके लिए ये काम मुश्किल नहीं था. लेकिन वो योगी, साक्षी और इसी तरह के लोगों को ज़ंजीर के बग़ैर खुला छोड़ देती हैं.

हमें समाज में, घर में, आंगन में कोई भी आदमी ऐसी वैसी बात करते देखता है तो उसे फ़ौरन डांट दिया दिया जाता है. अचानक दो पागल क़िस्म के लीडर खड़े होते है बेवकूफ़ी भरे बयान देते हैं और आपकी राय ये होती है कि ये उनकी निजी राय हो सकती है. तो ऐसा व्यक्ति आपके पास क्यों है जो आपके ख़िलाफ़ अपनी निजी राय रखता है.

मतलब साफ है कि आप ये चाहते ही हैं कि इस मुल्क़ में इत्तेहाद होने ही न पाए.बीजेपी इतनी बड़ी जीत के साथ सत्ता में आई थी अगर वो चाहती तो सूरत बदल सकती थी. जब मैंने साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाया तो मुझे पीएम ने बुलाया था तो मैंने कहा कि मैं अकेले नहीं आऊंगा, और भी कई बड़े लोगों ने लौटाया है उन्हें भी बुलाइए.

मुझसे मीडिया ने पूछा कि अगर आप पीएम से मिले तो क्या कहेंगे? मैनें कहा कि हम कोई बात नहीं करेंगे. हम पीएम का हाथ पकड़ कर उन्हें दादरी ले जाएंगे. अख़लाक़ के घर के पास जाकर उनसे कहेंगे कि काले कपड़े नहीं पहने है तो इतना कर ले, इक ज़रा देर को कमरे में अंधेरा कर ले. क्योंकि एक इंसान की मौ’त एक क़ौम की मौ’त है, एक क़ौम की मौ’त एक मुल्क़ की मौ’त है और एक मुल्क़ की मौ’त पूरी दुनिया की मौ’त है.

मैं एक शायर और हिंदुस्तानी होने के नाते यही कहूंगा कि अगर वो चाहें तो सबको मुहब्बत करें और सब इनको मुहब्बत करें. लेकिन ये पूरे मुल्क़ पर हुक़ूमत करना ही नहीं चाहते. ये तो सिर्फ़ हिंदू पर हुक़ूमत करना चाहते हैं. लेकिन ऐसा होता नहीं है. हम अपने 65 बरस के तजुर्बे से कह सकते हैं कि ऐसी कोई भी हुक़ूमत इतिहास के पन्नों में नक़लीपन के साथ भले रह जाए लेकिन असल में वो ज़िंदा रहती नहीं है.

देश में ऐसी कोई सियासी पार्टी नहीं है जो मुस्लिमों को भरोसा दिला सके कि यह देश आपका है और आप यहां सुरक्षित हैं. लेकिन वोट के लिए सब ऐसा कहते हैं. पर अगर ऐसा है तो पूरे देश में एक बार इस पर भी वोटिंग करा ली जाए कि मुसलमानों को यहां रहना चाहिए या नहीं.

तब ऐसे लोगों को अफ़सोस होगा जो मुस्लिमों को नहीं रखना चाहते है क्योंकि 80 प्रतिशत हिंदू कहेंगे कि नहीं ये हमारे भाई हैं, हमारे जैसे हैं, यहीं पैदा हुए हैं, यहीं रहना है, यहीं जीना-मरना है. ये यहां का चांद देखकर नमाज़ पढ़ते हैं, यहां की ज़मीन पर सज़दा करते हैं, तो ये हमारे साथ यहीं रहेंगे.

लेकिन ये जो सियासी लोग हैं वो अपने फ़ायदे के लिए कभी कह देते हैं कि ठीक है, कभी कह देते हैं कि नहीं ठीक है. चुनाव आता है तो दुकानें खुल जाती हैं और वोट बिकते हैं. क्या दाढ़ी वाला, क्या टोपी वाला, चोटी वाला, सबकी ख़रीद-फ़रोख़्त होती है.

सवाल यह भी है कि आज मुसलमानों में मज़बूत लीडरशिप क्यों नहीं है. मेरे ख़्याल से लीडर मांएं नहीं जनतीं, लीडर क़ौमें ख़ुद पैदा कर लेती हैं. हालात लीडर पैदा करते हैं. लीडर बनने के लिए ऐतबार ज़रूरी है लीडर वो हो सकता है जिस पर लोग ऐतबार करें. मुस्लिमों के यहां सूरत-ए-हाल ये हो गई है कि ख़रीद-फ़रोख़्त ने लीडर नहीं बनने दिया.

हम आपसे चाहे जैसी बात करें लेकिन मुझे कहीं का मेंबर बना दिया जाए और मुझे लाल बत्ती दे दी जाए तो हम बिक जाते हैं. इसलिए हमारे यहां लीडर नहीं पैदा हो पाए. अक्सर ही किसी भी मुसलमान को कह दिया जाता है कि वह पाकिस्तानी है. अरे आप अरबी कह दीजिए तो हम मान भी लें कि हां अरब से आए थे. पैदल चल के आए थे.

लेकिन पाकिस्तान से हमारा क्या लेना देना? पाकिस्तान तो जितना हमारा है उतना ही आपका है. वह तो हिंदुस्तान का हिस्सा रहा था. हमें आप पाकिस्तानी क्यों कहेंगे? अगर हम पाकिस्तानी हैं तो आप पहले पाकिस्तानी हैं. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि हम तो इस मुल्क़ को मादरे-वतन कहते ही हैं. हमारा मुल्क़ तो ये है ही हमारी मां भी यही है. यह मां का वतन है और मुसलमान इस मुल्क़ से बेपनाह मोहब्बत करते हैं.

(मशहूर शायर मुनव्वर राना और कृष्णकांत के बीच हुई बातचीत के कुछ अंश)