मुस्लि’म समुदाय के 50 प्रतिशत लोग, स्वभाव से ही अपरा’धी किस्म के होते हैं- पुलिस

नयी दिल्ली: देश में किये गए एक सर्वे के मुताबिक़ हर दूसरा पुलिस कर्मी यह सोचता है कि मुसलमा’न स्वभाव से ही अपरा’ध की तरफ झुके होते हैं| यह दावा कुछ गैर सरकारी संगठ’नों की ओर से किए गए एक सर्वे के आधार पर किया गया है जो एनजीओ कॉमन कॉज और सीएसडीएस की ओर से करवाया गया है जिसे मंगलवार को सुप्रिम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस जे चेमलेश्वर ने रिलीज किया है। आपको बता दें कि पुलिस ने सर्वे में मॉ’ब लिं’चिं’ग, पुलिस वालों पर पड़ने वाले राजनीतिक दबाव और छोटे मोटे कानूनों में संशोधन को लेकर भी अपनी राय जाहिर की है।

कॉमन कॉज और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिं’ग सोसाइटीज यानि सीएसडीएस के लोकनीति कार्यक्र’म की ओर से किया गया यह सर्वे स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया 2019 नाम की रिपोर्ट से प्रकाशित हुआ है। बता दें की इस सर्वे में 21 राज्यों में 12 हज़ार पुलिस वालों से बातचीत कर सर्वे रिपोर्ट बनाई गयी है| इसी के साथ इस सर्वे में पुलिसवालों के साथ उनके परिवार के लगभग 11 हज़ार सदस्यों को भी शामिल किया है|

सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक़ 35 फीसदी पुलिस वाले मानते हैं कि गोह’त्या में अप’राधि’यों को भी’ड़ की ओर से सजा दिया जाना स्वाभाविक घट’ना है। यही नहीं अगर दुष्क’र्म के आरोपि’यों की मॉ’ब लिं’चिं’ग हो जाती है तो भी 43 फीसदी पुलिस वाले मानते हैं कि ऐसा हो जाना बहुत ही स्वा’भावि’क है।

इतना ही नहीं चौंकाने वाली बात तो यह सामने आयी है कि पुलिस वालों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि छोटे मोटे अपरा’धों में आ.रोपियों को स’जा दिए जाने का अधिकार भी उन्हें ही मिल जाना चाहिए| सर्वे में 37 फीसदी पुलिस वालों ने बताया है कि मामूली अपरा’धों और छोटी मोटी स’जा देने का अधिकार कानूनी प्रक्रिया पूरी करने की बजाय पुलिस को ही सौंप दिया जाना चाहिए।

इसी के साथ इस सर्वे में एक बड़ा खुलासा ये हुआ है कि 72 फीसदी पुलिस वाले मानते हैं कि कुछ बड़े मामलों में उन्हें राजनीतिक दबा.व झेलना पड़ते है। खासकर तब जब किसी अपरा’ध में कोई प्रभा.वी व्यक्ति शामिल रहता है तो पुलिस वाले भारी दबा.व से गुजरते है।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक छोटे मोटे अपरा’धों में सजा पुलिस वालों पर छोड़ने की बात पर जस्टिस चेमलेश्वर ने अपनी राय देते हुए कहा कि एक समर्पित अधिकारी बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है। लेकिन ऐसे अफसरों की वहां तैनाती करेगा कौन|

इसके बाद जस्टिस चेमलेश्वर ने अपना भी कुछ अनुभव साझा किया जब पुलिस ने कानून को किनारे रख दिया था। उन्होंने कहा कहा कि हम हमारे अफसरों को क्या ट्रेनिंग देते हैं? सिविल और क्रि’मिनल प्रोसेड्योर कोड्स’ की छह महीने की ट्रेनिंग आईपी’सी और एविडें’स एक्ट मात्र को ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता है

इसके बाद उन्होंने पुलिस वालों को राजनीतिक प्रभाव से दूर रखने के बारे में कहा कि किसी को नाखुश करने के चलते सजा के तौर पर होने वाले ट्रांसफर असली समस्या है. फिर उन्होंने बताया कि यहां तक संवैधानिक पदों पर बैठे जज भी इससे सुरक्षित नहीं हैं इन पर भी ट्रांसफर की समस्या कभी भी आ सकती है|