तुर्की ने अमेरिका को दी चेतावनी कहा- “हम तुम्हारे गुलाम नहीं” हमने तुम्हारा खेल देखा है

तुर्की राष्ट्रपति रजब तय्यब एर्दोगान ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा है कि हम अमेरिका के गुलाम नहीं हैं इसलिए वाशिंगटन यह तय नहीं कर सकता है कि अंकारा को कौन सी हथियार प्रणाली खरीदनी है. तुर्की राष्ट्रपति एर्दोगन ने अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को दरकिनार रखते हुए ऐलान किया है कि एस-400 वायु रक्षा प्रणाली की निर्धारित की गई योजना के अनुसार ही तैनाती की जाएगी. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एस-400 सिस्टम की खरीद पर अमेरिकी दबाव के खिलाफ तुर्की मजबूती से डटा हुआ है.

एर्दोगान ने कहा कि तुर्की अपने व्यापार भागीदारों और हथियार आपूर्तिकर्ताओं को चुनने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है. उन्होंने कहा कि रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने के लिए डील हो चुकी है. अब किसी भी हालातों में वह इस डील से पीछे नहीं हटेंगे यह नैतिक नहीं होगा.

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उन्होंने कहा कि कोई हमसे ये नहीं पूछ सकता कि हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं? हम एक स्वतंत्र राष्ट्र हैं हम किसी के गुलाम नहीं हैं. रूस के साथ एस-400 मिसाइल सौदे होने से रोकने के लिए अमेरिका द्वारा बनाया जा रहा दबाव तुर्की को वायु रक्षा प्रणाली की उन्नत तकनीक एस-500 खरीदने को मजबूर कर रहा है.

बता दें कि अमेरिका लगातार रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के तहत तुर्की पर एस-400 मिसाइल सिस्टम डील खत्म करने के लिए दबाव बना रहा है. अमेरिका चाहता है कि तुर्की रूस से डील खत्म करके अमेरिकी पैट्रियल मिसाइलें खरीदे जिस पर तुर्की को लगभग 3.5 बिलियन डॉलर (करीब 245 अरब रुपये) खर्च करने होगे.

लेकिन तुर्की इन मिसाइलों को खरीदने के लिए शुरू से ही साफ माना करता रहा है. माना जा रहा है कि तुर्की में जुलाई 2019 तक एस-400 मिसाइलों को तैनात हो जाएगी. आपको बता दें कि भारत ने भी रूस के साथ एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने के लिए समझौता किया है.

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रूस के साथ हथियारों की खरीद पर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों की धमकी के बाद भी भारत ने 5 बिलियन डॉलर (लगभग 350 अरब रुपये) का यह समझौता किया है. भारत ने रूस के साथ अक्टूबर-2018 में यह करार किया था. भारत रूस की इस लंबी दूरी की मिसाइल प्रणाली के जरिए अपनी वायु रक्षा तंत्र को मजबूत करना चाहता है.

भारत इस वायु रक्षा प्रणाली को खास तौर पर चीन से लगी 3488 किमी सीमा पर तैनात करना वाला है. अमेरिका ने भारत के समझौते पर भी आपत्ति जाहिर की थी. लेकिन जब अमेरिका को लगा कि भारत किसी भी कीमत पर इस समझौते से पीछे नहीं हटेगा तो उसने इस सौदे को मंजूरी दे दी थी.