वो पाकिस्तानी औरत जिसकी वजह से अपने वतन लौटा हामिद अंसारी, कौन है ये महिला?

अपनी एक फेसबुक पर बनी दोस्त से मिलने के लिए साल 2012 में पाकिस्तान गए हामिद अब जाकर भारत लौट सके है. उन्हें पाकिस्तान के कोहाट में जासूसी और बिना दस्तावेज़ के आरोपों के चलते गिरफ्तार कर लिया गया था. उनकी माँ ने इस मौके पर कहा कि हामिद को भारत लाना एक सामूहिक प्रयास रहा है. दोनों देशों के सरकारी अधिकारीयों, मीडिया और कई एनजीओ ने हमारी मदद की. उन्होंने कहा कि ब्रिटेन से भी लोगों ने हमारी मदद की और अरविंद शर्मा नाम के वक़ील सुप्रीम कोर्ट में हमारा केस बिना फ़ीस के रखा.

हामिद की भारत वापसी में कई लोगों का योगदान रहा है और इनमें एक बड़ी मदद पाकिस्तान की मानवाधिकारों की वक़ील रख्शंदा नाज़ की भी रही हैं. इस मामले को लेकर रख्शंदा ने बीबीसी हिंदी से बातचीत की. उन्होंने बताया कि हामिद के बारे में मुझे भारतीय समाजसेवी रीता मनचंदा के जरिए पता चला था.

हालांकि मुझे पता चला था उससे पहले ही पाकिस्तानी पत्रकार और समाजसेवी ज़ीनत शहज़ादी ने इस केस को लेकर कोर्ट में अपील दायर कर दी थी और उन्होंने ही हामिद की कस्टडी की सारी जानकारी जुटाई थी. वर्ना किसी को कभी हामिद के बारे में पता ही नहीं चलता.

इसी के बाद में हामिद से मिली हमारी पहली मुलाकात पेशावर जेल में हुई थी. उसे जासूसी के मामले में जेल की सजा दी गई थी. मैंने उससे बात की और उसे विश्वास दिलाया कि हम उसे वापस भारत भेजेगें लेकिन उसे इस बात पर यकीन ही नहीं था की वह कभी वापस जा पाएगा.

उन्होंने कहा कि यह केस सोशल मीडिया से जुड़ा था जब मैंने ये केस देखा तो मुझे ये मामला सच्चा लगा. इसी दौरान मेरी हामिद के परिवार से बात हुई तब उन्हें मालूम पड़ा की उनका बेटा जिंदा भी है. यह मामला सीनियर एडवोकेट काज़ी मोहम्मद अनवर भी देख रहे थे और उनके प्रयासों से ही आज हमें कामयाबी मिली हैं.

उन्होंने कहा कि इस कामयाबी का पहला ज़ीनत को जाता है उनकी इंवेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग की वजह से ही यह मामला प्रकाश में आया था. हामिद ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के कोहाट की रहने वाली एक लड़की से मिलने के लिए आया था. जीनत ने उस लड़की और उसके परिवार से भी मुलाकात की थी.

उन्होंने बताया कि मैं जब उससे मिलने जेल जाती थी तो उसकी ज़रूरत का सामान लेकर जाती थी और हामिद उसी सामान से मेरे लिए खीर बनाकर रखता था. हम ने हमेशा उसे अपने परिवार का हिस्सा ही मना है हम उसे ईद पर मिटाई और कपड़े भी लेकर जाते थे. यह केस हमारे लिए यादगार रहा है यह वाक़या याद कर मेरी आंख में आज भी आंसू आ जाते हैं.