VIDEO: हैदराबाद निज़ाम, मीर उस्मान अली की दौलत को लेकर भारत-पाक में टकराव

हैदराबाद के सातवें निज़ाम, मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दिक़ी दुनिया के सबसे बड़े सखी यानी दानवीर माने जाते हैं लेकिन आज उनका ही पैसा उनको नहीं मिलने और दुसरे लोगों का उनपर कब्ज़ा करने की साज़ि’श सामने आ रही हैं| बता दें कि यह मामला है मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दिक़ी के दरबार में वित्त मंत्री रहे नवाब मोईन नवाज़ जंग का जिन्होने उस दौर में ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त के बैंक खाते में जो 10 लाख पाउंड भेजे थे वो आज 35 गुना बढ़ चुके हैं|

ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे हबीब इब्राहिम रहीमतुल्ला के लंदन बैक खाते में ट्रांसफर किए गए 10 लाख पाउंड क़रीब 89 करोड़ रुपए अब 350 लाख पाउंड यानी लगभग 3.1 अरब रुपए बन चुके हैं और उन्हीं के नाम पर उनके नैटवेस्ट बैंक खाते में जमा हैं|

बता दें कि निज़ाम और पाकिस्तान के उत्तराधिकारियों के बीच इन पैसों को लेकर लंबे वक़्त से तनाव लंदन में मौजूद रॉयल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में अब भी चल रहा है|

मामले में सुनवाई कर रहे जस्टिस मार्कस स्मिथ दोनों पक्षों की दलीलें सुन चुके हैं, और इसी साल अक्टूबर में इस मामले में फ़ैसला देने वाले हैं| अब उनका फ़ैसला ही तय करेगा कि निज़ाम के यह 3.5 करोड़ पाउंड की ये राशि किसके हाथों में जाएगी|

जानकारी के लिए आपको बता दें कि 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ, लेकिन दक्षिणी भारत के तेलंगाना राज्य की राजधानी हैदराबाद समेत कई राज्यों ने इस दिन आज़ादी का स्वाद नहीं चखा| हैदराबाद 17 सितंबर 1948 तक निज़ाम शासन के तहत उनकी रियासत बना रहा था इसके बाद ‘ऑपरेशन पोलो’ नाम के सैन्य अभियान के ज़रिए इस रियासत का विलय भारत में कर दिया गया|

बता दें कि उस वक़्त हैदराबाद निज़ाम के सातवें वंशज नवाब मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दिक़ी की रियासत हुआ करती थी| सातवें निज़ाम के पोते युवराज मुकर्रम जाह ने बताया कि ऑपरेशन पोलो के दौरान हैदराबाद के निज़ाम के वित्त मंत्री ने पैसों को सुरक्षित रखने के इरादे से क़रीब 10 लाख पाउंड उस वक़्त पाकिस्तान के हाई कमिश्नर के लंदन वाले बैंक खाते में ट्रांसफर किये थे|

इसके बाद उन्होंने बताया कि जैसे ही हैदराबाद के सातवें निज़ाम को पैसों के ट्रांसफर के बारे में पता चला तो उन्होंने पाकिस्तान से कहा कि उनके पैसे जल्द लौटा दे, लेकिन रहिमतुल्ला ने पैसे वापिस देने से इनकार करते हुए कहा कि ये अब पाकिस्तान की संपत्ति बन गई है| जिसके बाद से इन पैसों को लेकर दोनों के बीच कानूनी जंग चल रही है|

बता दें कि 1967 में हैदराबाद के सातवें निज़ाम की मौत हो गई, लेकिन उनके उत्तराधिकारियों ने पैसों को वापस पाने की ये क़ानूनी जंग जारी रखी है| पाकिस्तान ने अपनी दलीलें पेश करते हुए कहा कि 1948 में हैदराबाद के भारत में विलय के दौरान पाकिस्तान ने पूर्व निज़ाम की काफ़ी मदद की थी, ये पैसा उसी मदद के एवज़ में पूर्व निज़ाम ने पाकिस्तान के लोगों को तोहफ़े के तौर पर दिया था और इस कारण इस पर पाकिस्तान का हक़ है|

वहीँ दूसरी ओर निज़ाम के परिवार का कहना है कि ऑपरेशन पोलो के दौरान ये पैसा हिफ़ाज़त से रखने के लिए पाकिस्तानी उच्चायुक्त के खाते में भेजा गया था| इसी के चलते पॉल हेविट्ट ने कहा कि साल 2016 में पाकिस्तान ने ये दलील भी पेश करते हुए कहा था कि साल 1947 से 48 के बीच हथियार पाकिस्तान से हैदराबाद लाए गए थे, ये 10 लाख पाउंड उसी की क़ीमत है|

दोनों पक्षों कि दलीलों को देखते हुए पॉल हेविट्ट ने कहा कि निज़ाम के उत्तराधिकारियों द्वारा दिए गए सबूतों को अब तक चुनौती नहीं दी गई है, इससे इस बात का इशारा मिलता है कि उस वक़्त उनके वित्त मंत्री को लगा था कि वो निज़ाम के भविष्य के लिए कुछ पैसे सुरक्षित रख रहे हैं और इसी सहमति के आधार पर रहिमतुल्ला ने अपने खाते में पैसे रखने की बात स्वीकार की थी|

इसी के साथ उन्होंने यह भी बताया कि जब सातवें निज़ाम को इस बात का अंदाज़ा हुआ कि शायद वो अपने जीवनकाल में ये पैसा वापिस नहीं पा सकेंगे तो उन्होंने एक ट्र्स्ट बनाया और उन्होंने इन पैसे को अपने ट्र्स्ट में ही जोड़ दिया साथ ही इसके दो ट्रस्टी बनाए एक तो उनके उत्तराधिकारी उनके दोनों पोते- आठवें निज़ाम और दुसरे उनके छोटे भाई, इसी कारण से अब ये दोनों ही इस परिवार के वो सदस्य हैं जिनका अधिकार इन पैसों पर है|