इस्लाम धर्म से ज़्यादा दूसरे धर्मों मे छोड़ी गई हैं महिलाएं, तो फिर इस्लाम धर्म पर ही कानून क्यों?

देश में इन दिनों तीन तलाक बिल चर्चा का विषय बना हुआ है. मोदी सरकार इसे पास करने में अपना पूरा जोर लगा रही है. इस बीच मुस्लिम महिलाओं को देश में बेहद ही दयनीय स्थिति में बताते हुए इस बिल को जरुरी कहा जा रहा है और इसके लिए समर्थन मंगा जा रहा है. लेकिन अब सवाल यह है कि क्या देश में मुस्लिम औरतों की स्थिति सचमुच में उतनी ही ख़राब है जितनी मोदी सरकार दावा कर रही है? क्या मुस्लिम औरतें सामाजिक और आर्थिक तौर पर नाज़ुक स्थिति में हैं जैसा कि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में कहा हैं?

लेकिन आकंड़ों को देखा जाए तो पता चलता है कि मुस्लिम महिला से ज्यादा दुसरे धर्मों की महिलाओं की स्थिति दयनीय है. यह वो महिलाऐं है जिन्हें उनके पतियों ने एकतरफा तरीके से छोड़ दिया है और यह महिलाऐं बेहद ही मुश्किल हालातों में अपना जीवन काट रही है.

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पीएम मोदी अपने भाषणों में लगातार दावा करते है कि मुस्लिम महिलाओं की स्थित दयनीय है लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं बताया कि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति हिंदू, ईसाई और दूसरे धार्मिक संप्रदायों की महिलाओं की तुलना में कैसी है?

यह जानने के लिए हम जनगणना के आंकड़ों पर एक नज़र डालते है. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार वैवाहिक संबंधों में रहने वाली महिलाओं का प्रतिशत सबसे ज़्यादा मुस्लिमों में जो 87.8 प्रतिशत है जबकि यह हिंदुओं में 86.2 प्रतिशत, ईसाइयों में 83.7 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 85.8 प्रतिशत है.

वहीं विधवा महिलाओं का सबसे कम प्रतिशत मुसलमानों में 11.1 प्रतिशत है जबकि हिंदुओं में यह 12.9, ईसाइयों में 14.6 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 13.3 प्रतिशत है. वहीं अलग की गईं और त्याग दी गईं (छोड़ी गईं) औरतों का सबसे कम प्रतिशत भी मुस्लिमों में (0.67 प्रतिशत) है.

जबकि यह आंकड़ा हिंदुओं में 0.69, ईसाइयों में 1.19 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 0.68 प्रतिशत है. वहीं हम छोड़ी गई महिलाओं पर बात करें तो उन्हें आर्थिक ही नहीं सामाजिक परेशनियों का भी सामना करना पड़ता है. उन्हें समाज के लोग पूछते है कि उन्हें उनके पति ने क्यों छोड़ा? क्या गलती की थी उन्होंने?