अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ‘जमीयत उलेमा ए हिंद’ ने दाखिल की पुनर्विचार याचिका

नई दिल्ली: पिछले 70 साल से कानूनी लड़ाई में उलझे अयोध्या के राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अपना फैसला सुनाया था इस फैसले के साथ ही सबसे पुराने विवाद का अं’त होता दिखा. हालांकि, जिस तरह से मुस्लि’म और हिंदू पक्ष विवा’दित जमीन पर दावा करते आए उससे अंदेशा तो पहले से ही था कि आखिरी फैसले के बाद भी अयोध्या विवाद आसानी से हल नहीं होने वाला है। और अब अयोध्या मामले पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और कुछ मुस्लि’म पक्षकारों की सहमति के बाद रिव्यू पिटिशन दाखिल कर दी है।

आपको बता दें (AIMPLB) ने सोमवार को पुनर्विचार याचिका दायर की और कहा कि बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश देने पर ही न्याय हो सकता है।बता दें त’त्काली’न प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बीते नौ नवंबर को अपने फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ विवा’दित भूमि रामलला को सौंपने और मस्जिद निर्माण के लिए उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ जमीन देने का केंद्र सरकार को निर्देश दिया था।

जमीयत उलेमा ए हिंद ने दाखिल की पुनर्विचार याचिका

हलाकिसुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में चुनौती नहीं देने का फैसला लिया था लेकिन इस प्रकरण के मूल याचिकाकर्ताओं में शामिल एम. सिद्दीक के कानूनी वारिस और उत्तर प्रदेश जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद अशहाद रशीदी ने 14 बिंदुओं पर शीर्ष अदालत के निर्णय पर पुनर्विचार के लिए याचिका दायर की है।

वही मुस्लि’म पक्ष की और से दायर पुनर्विचार याचिका में नौ नवंबर के फासले फैसले पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है. इस फैसले में न्यायालय ने मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट गठित करने का निर्देश केंद्र को दिया है। वही रशीदी ने अयोध्या में प्रमुख स्थान पर मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ का भूखंड आवंटित करने के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार के न्यायालय के निर्देश पर भी सवाल उठाया है।

उनका तर्क है कि मुस्लि’म पक्षकारों ने इस तरह का कोई भी मांग कभी नहीं की गई।याचिका में दलील दी गई है कि विवा’दित स्थल पर मस्जिद गिरा’ने सहित हिंदू पक्षकारों द्वारा अनेक अवै’धता’ओं का संज्ञा’न लेने के बावजूद शीर्ष अदालत ने उन्हें माफ कर दिया और भूमि भी उनको दे दी। पुनर्विचार याचिका के अनुसार, इस फैसले के माध्यम से न्यायालय ने बाबरी मस्जिद न’ष्ट करने और उसके स्थान पर वहां राम के मंदिर के निर्माण का आदेश दे दिया है।

वही दायर की गई याचिका में कहा गया है कि यद्य’पि फैसले में न्यायालय ने हिंदू पक्षकारों की अनेक अ’वैध ता’ओं विशेषकर 1934 में (बाबरी मस्जिद के गुंब’दों को नुकसान पहुंचाना 1949 बाबरी मस्जिद को अपवित्र करना और 1992 बाबरी मस्जिद को गिराना का संज्ञान लिया है।

फिर भी उसने इन गैरकानूनी कृत्यों को माफ करने और विवा’दित स्थल को उसी पक्ष को सौंप दिया जाने और जिसने अनेक गैरकानूनी कृत्यों के आधार पर अपना दावा किया था।

आपको बता दें रशीदी ने 93 पेज की अपनी पुनर्विचार याचिका में यह भी दलील दी है कि संविधान पीठ ने संविधा’न के अनुच्छेद 142 का गलत तरीके से इस्तेमाल करके गलती की है क्योंकि पूर्ण न्याय करने या फिर अ’वै ध’ता को सही करने के लिए सिर्फ बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश दिया जा सकता है।