जंगे यमामा में जब हाफ़िजों की एक बड़ी संख्या शहीद हो गई तो सबसे पहले हज़रत उमर फ़ारूक़…

जंगे यमामा में जब हाफ़िजों की एक बड़ी संख्या शहीद हो गई तो सबसे पहले हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ि0 को क़ुरान मजीद तहरीरी शक्ल में जमा करने का एहसास हुआ, अतः आप अमीरुल मोमिनीन हज़रत अबु बक्र सिद्दीक़ रज़ि0 की ख़िदमत में हाज़िर हुए|

और अर्ज़ किया “जंगे यमामा में क़ुरान मजीद के हाफ़िजों की एक बड़ी संख्या शहीद हो चुकी है अगर जंगों में इसी तरह हाफ़िज शहीद होते रहे तो ख़तरा है कहीं क़ुरान मजीद का एक बड़ा हिस्सा ख़त्म न हो जाए, अतः आप क़ुरान मजीद जमा करने का आयोजन करें|” हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि0 ने फ़रमाया “जो काम रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहिस्सलाम ने अपनी पवित्र जीवनी में नहीं किया वह काम मैं कैसे कर सकता हूं?

हज़रत उमर रज़ि0 ने जवाब दिया “अल्लाह की क़सम ! यह काम बेहतर ही बेहतर है| “उसके बाद अल्लाह तआला ने उस काम के लिए हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि0 का सीना खोल दिया और आपने हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि0 को बुलाकर फ़रमाया “तुम नौजवान और समझदार आदमी हो, तुम्हारे बारे में किसी को बदगुमानी नहीं, तुम रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहिस्सलाम के सामने किताबत करते रहे हो, अतः क़ुरान मजीद की आयत तलाश करके उन्हें जमा करो|

हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि0 फरमाते हैं “अगर ये लोग (अर्थात हज़रत अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ि0 और हज़रत उमर रज़ि0) मुझे कोई पहाड़ एक जगह से दूसरी जगह मुंतक़िल करने का हुक्म देते तो मेरे लिए इतना मुश्किल न होता जितना क़ुरान मजीद को जमा करने का काम मुझे मुश्किल लगा|

हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि0 बार बार हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि0 को इस काम की तरफ़ ध्यान दिलाते रहे यहां तक कि अल्लाह तआला ने हज़रत ज़ैद रज़ि0 का सीना इस काम के लिए खोल दिया और उन्होंने इस काम को शुरू कर दिया|

हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि0 ने कितनी मेहनत और लगन से क़ुरान मजीद जमा किया, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जो आदमी कोई आयत लेकर हज़रत ज़ैद रज़ि0 के पास आता, आप उसकी निम्न चार तरीक़ों से तस्दीक़ फरमाते

1• हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि0 ख़ुद हाफ़िज़ थे, अतः सबसे पहले अपनी याददाश्त से उसकी तस्दीक़ फरमाते|

2•हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ि0 भी हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि0 के साथ क़ुरान मजीद जमा करने की ख़िदमत में शरीक थे और हाफ़िज़े क़ुरान भी थे, अतः वे भी आयत की तस्दीक़ करते |

3•हज़रत ज़ैद रज़ि0 उस वक़्त तक कोई आयत क़ुबूल न करते जब तक भरोसेमन्द गवाह इस बात की गवाही न देते कि हां हक़ीक़त में यह आयत रसूल सल्लल्लाहु अलैहिस्सलाम के सामने ऐसे ही तहरीर की गई थी|

4•आख़री में प्रस्तुत आयत का मुक़ाबला दूसरे सहाबा किराम रज़ि0 की लिखी हुई आयतों से किया जाता|

जो आयत इन चार शर्तों पर पूरी उतरती, उसे क़ुबूल कर लिया जाता| इस जमा शुदा नुस्ख़े को “उम्म” कहा जाता है| इस “उम्म” में तीन स्पष्ट गुण ये थे:

1• तमाम सूरतों की आयत की तर्तीब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहिस्सलाम की बतलाई हुई तर्तीब के मुताबिक़ तै कर दी गई|

2•इस नुस्ख़े में क़िरअत के साथ अक्षर या स्वर मौजूद थे ताकि जो इंसान जिस अक्षर या स्वर में आसानी से क़ुरान पढ़ सके, पढ़ ले |

3• सूरतों की तर्तीब तै नहीं की गई थी बल्कि तमाम सूरतें अलग सहीफ़ों की शक्ल में जमा की गई थीं|

सिद्दीक़ी दैर में यह नुस्ख़ा हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि0 के पास महफ़ूज़ रहा|हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि0 की वफ़ात के बाद फ़ारूक़ी दौर में यह नुस्ख़ा हज़रत उमर रज़ि0 के पास रहा और हज़रत उमर रज़ि0 की शहादत के बाद यह नुस्ख़ा उम्मुल मोमिनीन हज़रत हफ्सा रज़ि0 बिन्ते हज़रत उमर रज़ि0 के पास महफ़ूज़ कर दिया गया|

उम्मत तक क़ुरान पहुचाने के लिए सहाबा किराम रज़ि0 ने जिन मेहनत और लग्न से कोशिश की क्या हम उतनी मेहनत और लग्न से क़ुरान को पढ़ रहे है और अमल कर रहे हैं?