सम्प्रदायिक’ता पर ‘लॉकडाउन’ के लिए, मुस्लि’म बुद्धिजीवी, मौलाना TV डिबेट में जाना बन्द करें

देशभर में कोरोना अपने पाँव पसारता जा रहा है. देश का मीडिया कोरोना के फैलने का ठीकरा जमातियों पर फोड़ता नज़र आ रहा है. रही सही कसर देश के कुछ मुस्लि’म बुद्धिजीवी, सोशल एक्टिविस्ट, छोटे-मोटे प्रवक्ता और मौलाना, धर्मगुरु मीडिया की डिबेट में जाकर पूरी करवा रहे हैं. इन्हें प्रति डिबेट 2-3 हज़ार रुपए से लेकर 5 हज़ार रुपए तक की राशी डिबेट में आने के लिए दी जाती है. जिसके बदले में इन्हें ज़ली’ल होना पड़ता है, या किसी सवाल पर उल्टा-सीधा जवाब देना होता है.

अगर देश भर के ये सारे तथाकथित मुस्लि’म बुद्धिजीवी, सोशल मीडिया के झोलाछाप सोशल एक्टिविस्ट, छोटे-मोटे मुसलमानों के सामाजिक प्रवक्ता और कुछ बिकाऊ मौलाना, तथाकथित मुसलमानों के जबरजस्ती बन गए धर्मगुरुओं से स्थानीय और इनके पहचान के लोगों को इनसे विनती करनी चाहिए कि मीडिया TV चैनलों पर डिबेट में जाना बन्द करें.

say no to tv dibates

इस तरह से कम से कम मीडिया द्वारा बिठाये गए दूसरे प्रवक्ताओं और उन न्यूज़ चैनलों के एंकरों पर काफी लगाम लगेगी जो TV डिबेट में आये इन तथाकथित मुसलमानों के धर्मगुरुओं और मौलाना पर कीचड़ उछालने का काम करते हैं, उनको डिबेटों के दौरान घुड़क कर चुप करा दिया जाता है.

इस तरह से इस देश के मीडिया पर ‘साम्प्रदायि’क लॉक डाउन’ लगने की उम्मीद की जा सकती है. वेसे भी आज तक इन लोगों ने TV डिबेट में जा-जाकर कौम के लिए क्या कर लिया, और फिर देश में मुसलमानों को ‘कोरोना ब’म’ बताने वाली इस मीडिया के साथ क्यों बैठना  हैं ये लोग समझ नहीं आता.

जैसा कि आप सब अच्छी तरह से जानते हैं, कि इस वक्त देश में तबलीग़ जमात को लेकर मीडिया ने किस तरह का माहौल बनाया हुआ है. जिसमें मीडिया कोरोना का ठीकरा सिर्फ और सिर्फ तबलीग़ जमात पर फोड़ना चाह रही है.

जबकि अगर वास्तविकता की बात की जाए तो, हमें कोरोना से निपटने के लिए जनवरी के महीने में ही इस तरह से लॉक डाउन कर देना था, जैसा कि आज वर्तमान में हम लोग कर रहे हैं.

2 महीने वाद के इतने लंबे समय के बाद जाकर, लोगों को होश आया है कि वाकई में यह कोरोना क्या चीज़ है. अगर जनवरी के महीने में ही इसकी गंभीर’ता को समझ लिया जाता तो आज यह नौबत ना आती.

चलिए बात करते हैं उस सांप्रदायिक’ता भरे माहौल की जो मीडिया के जरिए इस देश के हर आम और खास तक जा पहुंचा है. इसका नतीजा यह हुआ है कि तमाम शहरों की कॉलोनियों और मोहल्लों तथा ग्रामीण इलाके में बसी उन कई बस्तियों से खबरें आ रही हैं कि लोग किसी भी मुसलमान फल या सब्ज़ी विक्रेता से सामान नहीं खरीदना चाहते.

मीडिया ने देश के मुसलमानों की एक निगेटिव छवि तैयार कर दी है, मानो वह कोई इंसान ना होकर खुद साक्षात कोरोना है. उसकी वजह से कोई भी अपनी कॉलोनी या मोहल्ले में किसी मुसलमान सब्जी वाले या फल वाले को या तो घुसने नहीं देना चाहता, या कोई आ भी जाय तो ये लोग उससे सामान ख़रीदना पसंद नहीं करते.

पिछले कुछ सालों में हमारे देश की हालत इस बिकाऊ मीडिया ने खोखली कर दी है. देशभर में कुछ भी हो जाए, मीडिया को उसको या तो पाकिस्तान से जोड़ कर दिखाना है, या फिर देश के मुसलमान के सर ठीकरा फोड़ना है.

पूरा मीडिया, अपनी आदत के अनुसार इस देश के असली हालात दिखाने से कतरा रहा है, मीडिया अभी सिर्फ मस्जिदों और मदरसों में जमातियों को ढूंढने का काम कर रहा है, इसके अलावा देशभर में कहां-कहां कितने मुस्लि’म कोरोना संदि’ग्ध हैं और कितने कोरोना पॉजिटिव हैं इनकी गिनती की जा रही है.

सोशल मीडिया पर तमाम ऐसे वीडियो और फोटो पोस्टर मौजूद हैं, जिनमें कहीं ना कहीं मुस्लि’मों को प्रताड़ि’त करना या उन्हें गालि-यां देना या उन्हें अपनी कॉलोनी, अपने गली मोहल्लों से घुड़क कर भगा देने के वीडियो सामने आ रहे हैं… वे भी इस देश के नागरिक हैं उनका भी उतना हक़ इस देश पर है जितना कि और लोगों का.