कानपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की मुसलमानों से अनूठी अपील

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री अनंत देव ने होली त्यौहार को लेकर मुसलमानों से अनूठी अपील की है. होली के त्यौहार पर अमन बनाए रखने के लिए पैगंबर साहब के किरदार का हवाला देकर एसएसपी साहब ने मुसलमानों से अपील में अनंत देव ने कहा कि अक्ल और होश का दामन मत छोड़ना वर्ना शैतान का फितना काम कर जाएगा. मुसलमानों से अपील करते हुए उन्होंने एक पेम्पेल्ट जारी किया है जो पुरे राज्य में चर्चा का विषय बना हुआ है.

अनंत देव ने कहा कि आप उस पैगंबर के उम्मती है जिनके किरदार की खुशबू से पत्थर भी पिघल गये थे. मुसलमान भाईयों होली के त्यौहार में अगर किसी बच्चे से रंग लग जाए तो गुस्सा न करे आपको पैगंबर साहब उस बुढ़िया की तबियत खराब होने पर देखने गए थे जो कभी उन पर कूडा फेंका करती थी.

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उन्होंने आगे कहा कि मुसलमान उस पैगंबर के उम्मती है जो अपने हुस्न ओ अखलाक के लिए जाने जाते है. मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि होली या बहुसंख्यकों के अन्य त्योहार आते ही शासन प्रशासन से मुसलमानों के लिए ऐसी अपील क्यों जारी होने लगती है ?

जबकि पुलिस प्रशासन ने ऐसी ही कोई अपील मुहर्रम, ईद या बकरीद पर बहुसंख्यक समाज से की हो मुझे ध्यान नहीं आता है. और ऐसा तब है कि जब कि होली जैसा त्योहार कई बार जुमे और रमज़ान तक में पड़ा पर मुसलमानों ने कभी भी कोई अप्रिय घटना नहीं की.

इसके उल्ट बकरीद और मुहर्रम पर भगवा गिरोह द्वारा विरोध या उत्पात मचाने के कई उदाहरण हमारे सामने आते रहे है. दरअसल यह एक प्रोपगंडा है जिससे यह परसेप्शन बने कि मुसलमान होली में रंग पड़ने पर विरोध में दंगा फसाद या हिंसा करते हैं और प्रशासन को इसी कारण ऐसी अपील करनी पड़ी रही है.

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जबकि हकीकत यह है कि होली में अधिकांश बहुसंख्यक स्वयं ही बिना रंग पड़े साफ कपड़े पहने लोगों पर रंग नहीं डालते हाँ कुछ नशे में धुत, ज़हरीले और उद्दंड लोग ऐसा अवश्य करते है और वो भी इसलिए ऐसा करते हैं जिससे बिना रंग वाला कपड़ा पहने लोग नाराज़ हों और किसी झगड़े की संभावना हो.

ऐसे में अब सवाल यह है कि जो लोग ऐसा कार्य जानबूझ कर शरारतन करते हैं, उनको राम का उदाहरण देकर कभी समझाया क्यों नहीं जाता या उनके फिर भी ऐसा ना करने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही क्यों नहीं की जाती हैं? गज़ब का खेल है इस व्यवस्था का, हर कोई अपने अनुसार मुसलमानों के खिलाफ परसेप्शन बनाने में लगा रहता है.

मोहम्मद ज़ाहिद (लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता है)