रमज़ान से जुड़े वह सवाल जो किसी के भी मन में आ सकते है, जानिए ऐसे ही सवालों के जबाव

रमज़ान (Ramadan) को लेकर पहला सवाल तो यह होता है कि इसकी शुरूआत कब हो रही है, क्योंकि रमज़ान की शुरुआत चांद देखने के बाद ही होती है। इस साल रामज़ान Ramzan 2022 की शुरूआत 2 अप्रैल से हो सकती है बाकि चांद पर निर्भर है, ये तारिख बदल भी सकती है। रमज़ान से जुड़े कुछ ऐसे ही सवालों की आज हम बात करने वाले है जो किसी के भी मन में उठ सकते हैं।

ये रमज़ान है या रमादान

सोशल मीडिया पर आपने कहीं रमादान Ramadan 2022 मुबारक लिखा देखा होगा तो कहीं रमज़ान Ramazan 2022 मुबारक. ऐसे में सवाल आता है कि ये रमज़ान है या रमादान? रमज़ान उर्दू लफ्ज है जबकि रमादान अरबी है। अरबी में इसे रमादान कहते हैं हालांकि इससे सभी मुस्लिम स्कॉलर इत्तेफाक नहीं रखते है।

रमज़ान असल में है क्या?

रमज़ान मुस्लिम कैलेंडर का नौवां महीना होता है और इसे साल में सबसे पवित्र महीना कहा जाता है। पैगंबर मुहम्मद साहब के अनंसार जब रमज़ान का महीना शुरू होता है तो जहन्नुम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं।

यानी यह महीना नेकियों का है. इसमें मुस्लिम रोज़ा रखते है और कुरान की तिलावत (पढ़ते) पूरी कसरत से करते हैं. कहा जाता है कि जितना कुरान पढ़ेंगे उतना सवाब होगा. गुनाह माफ़ किए जाएंगे और जन्नत के हकदार बनेंगे.

रोज़ा कैसे रखा जाता है?

इस्लाम के फाइव पिलर में से एक रोज़ा है. यह सभी बालिग़ पर वाजिब है यानी उन्हें पूरे महीने के रोज़े रखने ही रखने हैं. सिर्फ बीमार, प्रेग्नेंट औरतें, बच्‍चे और जो यात्रा पर हैं, उसे ही इससे छूट दी गई है।

रोज़ा रखने के लिए सूरज के निकलने से पहले ही खाना पीना करना होता है फिर पूरे दिन न तो कुछ खाना है और न पीना है. पीना मतलब सिगरेट, बीड़ी का धुआं भी नहीं, इस दौरान बीवी-शौहर से सेक्स के बारे में सोच भी नहीं सकते है.

अगर रोज़ा है तो आप मुंह का थूक भी अंदर नहीं निगल सकते है। इस दौरान किसी से जलने, किसी की चुगली, किसी पर गुस्सा करने से भी परहेज़ करना है। शाम को सूरज छिपने के बाद जो खाया जाता है उसे इफ्तार कहा जाता है और जो तड़के में खाते हैं उसे ‘सहरी’ कहतेे है।

क्या रमज़ान में वज़न घट जाता है?

रोज़ेदार पूरा दिन कुछ नहीं खाते है, ऐसे में ये सवाल जरूरी हो जाता है, क्‍योंकि जब कुछ नहीं खाया जाता है तो वज़न घट जाता होगा. लेकिन रमजान में वज़न नहीं घटता है, क्योंकि सहरी और इफ्तार में खाना खाया जाता है।

इस दौरान जो खाना लिया जाता है वह बहुत हैवी होता है, इसमें खूब प्रोटीन, वसा होते है. जो वज़न नहीं घटने देतेे है. दूसरा पूरे दिन में इतनी थकावट हो जाती हैं कि सहरी और इफ्तार के बाद टहला नहीं जाता है जिससे वो खाना हज़म नही हो पाता है।

मियां, हर साल रमज़ान की तारीख क्यों बदल जाती है?

इस्लामिक कैलेंडर चांद के मुताबिक होता है, इसलिए रामज़ान की तारीख बदलती रहती है। इसमें साल भर में 354 दिन होते हैं यानी अंग्रेजी कैलेंडर से 13 दिन कम। ऐसे में हर साल हर मुस्लिम त्योहार 11 दिन पहले ही आ जाता है।

क्या सुन्नी मुस्लिम और शिया मुस्लिम के रोज़े अलग होते हैं

सुन्‍नी और शिया में रोज़ा रखने में कोई फर्क नहीं है लेकिन सहरी करने और इफ्तार में थोड़ा फर्क ज़रूर होता है। उदाहरण के तौर पर सुन्नी मुसलमान अपना रोजा सूरज छिपने पर खोलते हैं या‍नी अब सूरज बिल्कुल दिखना नहीं चाहिए।

वहीं शिया मुस्लिम आसमान में पूरी तरह अंधेरा होने के बाद सहरी लेते है। इसी तरह तड़के में सुन्नी मुसलमान से 10 मिनट पहले ही शिया मुसलमान के खाने का वक़्त ख़त्म हो जाता है।