देश के मुसलमानों के लिए, ‘तीन तलाक़’ के मुद्दे पर सिर्फ क़ुरआन का कानून ही सबसे बेहतर

2019 का ये नया साल भारत में मुस्लि’म महिलाओं के जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का लेकर आया है. केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय के इस एक भाग पर अपनी विशेष मेहरबानी की है. लाखों छात्रों को लुभावनी स्कॉलरशिप देने का वायदा भी किया गया है. वहीं पिछले कई महीनों से चला आ रहा तीन तलाक़ भी मोदी सरकार ने संसद में पेश किया जो साल 2018 में लोकसभा में पहले पारित हो गया था, लेकिन राज्यसभा में इस बिल को पास करने में विलम्ब हो गया था.

लेकिन जैसे ही 2019 लोकसभा चुनाव हुए और सरकार वापिस सत्ता में आयी तो इसके बाद ट्रिपल तलाक पर सबसे पहले कानून लाया गया. और ये राज्यसभा और विधानसभा में पास भी हो गया. अब तीन तलाक़ देना एक संज्ञेय अपरा’ध माना जाएगा, जिसमें तलाक़ देने वाले की तुरंत गिरफ्तारी और उसको तीन साल तक की स’जा और जुर्माने दोनों का प्रावधान लागू कर दिया गया है.

हालांकी मुसलमानों में यह बात बिलकुल साफ है, कि उनके धर्म में तीन तलाक़ जैसी कुरीती को मानने वाले का वो बहि’ष्कार करते हैं, लेकिन इस कुप्र्ता को बदलने की हिम्मत किसी ने नहीं की. अगर वक़्त रहते ऐसा हो जाता कि सरकार से पहले ही देश के उलेमा और संगठन मिलकर इसका हल निकाल सकते तो सरकार को भी इसमें दखल देने की ज़रुरत नहीं पड़ती .

जिन लोगों के लिए शादी कोई सात जन्मों का बंधन नहीं है, और ये महज उसको एक कॉन्ट्रैक्ट की तरह मानते हैं. जिसमें जब रिश्ता जोड़ा जाता है तब लड़का और लड़की के बीच एक मिडीयेटर होता है, जिसमें लड़का एक तयशुदा रकम मेहर के रूप में अदा करता है.

उस दौरान ये सब कुछ लिखित रूप में होता है, जिसका बाकायदा वकील और निकाह पड़ने वाला काज़ी मौजूद होता है. अगर देखा जाय तो हर धर्म में येही सिस्टम है. बस तरीके अलग अलग हो सकते हैं. क्या हिन्दू धर्म में तलाक़ नहीं होते? देश में लाखों विध’वाएं और तलाक शुदा गैर मुस्लि’म महिलाएं हैं जो आज तक इन्साफ मांग रही हैं.

उनको भी तो एक कॉन्ट्रैक्ट के तेहत ठुकरा दिया गया. क्या सरकार को यह नज़र नहीं आतीं? जबकि अगर देखा जाय तो मुसलमानों में तीन तलाक़ का उनकी आबादी के हिसाब से 1% भी नहीं है. साल, छह महीने में कोई एकाध केस सुनने में आता है.

इधर बात चली हैं तो ये भी सामने आया हैं कि निकाहनामा में बदलाव करके उसे मॉडल बनाया जा सकता हैं। लखनऊ में ऐशबाग ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली के अनुसार लड़की भी चाहे तो तलाक दे सकती है।

इसके लिए लड़की निकाहनामे में ये शर्त रख सकती है कि ट्रिपल तलाक नहीं होगा। इसके अलावा लड़की चाहे तो अपने तरफ से भी तलाक दे कर विवाह को खत्म कर सकती।

वैसे जिस तलाक ए बिददत की बात हो रही हैं उसमें भी ये प्रावधान है कि पहले और दूसरी बार तलाक कहने में समय का अंतर होना चाहिए और इस दौरान परिवार के बड़ो को विवाह को बचाने की कोशिश करनी चाहिए।

विपक्ष भले ही इसको मुद्दा बना ले लेकिन आने वाले समय में अगर ये विधेयक लागू हो गया तो मुकदमे, गिरफ्तारियां और स’जा तो होनी ही है। वैसे भी ट्रिपल तलाक मुसलमानों में सिर्फ सुन्नी समुदाय तक सीमित हैं। शिया समुदाय में ट्रिपल तलाक मान्य नहीं है।