तीन तलाक पर बोले मौलाना अरशद मदनी, कहा- मजहबी आजादी हमारा बुनियादी हक, सरकार को दख’ल का अधिकार नहीं

नई दिल्ली: एक साथ दी जानी वाली तीन तलाक़ शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकार के द्वारा पेश किये गए इस बिल पर जमीअत उलमा ए हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हमारे लिए इस बिल की कोई अहमियत नहीं है। सरकार चाहे कितने भी बिल ले आये और कानून बना ले देश के मुसलमान अपने कौमी मामलों में सरकार के बनाए हुए कानून पर नहीं चलेंगे। वह शरीयत को मानता हुआ आया है, और आगे भी शरीयत के हिसाब से ही चलेगा। जब सारी दुनिया के मुसलमान, शरीयत के हिसाब से अपना काम करते हैं। और कौमी निजाम को चलाते हैं तो भारत का मुसलमान उससे अलग कैसे हो सकता है।

मोदी सरकार द्वारा दिए गए तीन तलाक के बिल पर राष्ट्रीय उलमा ए हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ने बताया कि हमें सरकार के इस बिल की ज़रा सी भी अहमियत नहीं है। मुसलमानों को उनके धर्म के अनुसार ही काम करने दें तो अच्छा है। जब कोई मान हे नहीं रहा तो ऐसे बिल लाने का कोई मतलब भी नहीं रह जाता। इस तरह के बिल पर देश के मुसलमान की कोई रजामंदी भी नहीं थी।

इस देश में दो तरह के तबके वाले मुसलमान हैं। एक को इस बिल से फर्क पड़ने वाला है, जबकि दूसरे तबके के मुसलमान को इससे शायद इससे कुछ भी फर्क न पढ़े| पहले तबके वाला मुसलमान वह है जो रोजा रखता है, नमाज पढ़ते हैं और दीन ईमान की बात करते हैं।

जबकी दुसरे तबके वाला मुसलमा’न जिससे इस तरह के बिल से शायद रत्ती भर भी फर्क न पढ़े। जो न तो नमाज़ पढ़ता है और न ही रोजा रखता है| और तो और एक मुसलमा’न के लिए इस्लाम में जिन कामों को नाजाय’ज बताया गया है वो सब काम करता है। जैसे जुआ खेलेगा शराब पीना ज़िनाखो’री करना सूदखो’री करना ब्याज खाना जैसे कामों में वो मुब्तला हो चुका है। जिसे शरीअत और किसी भी तरह के कानून से कोई मतलब नहीं है।

सरकार ने जब इस तरह के बिल को बनाया तो उसमें उन्हें मुसलमा’न की रजामंदी भी लेनी चाहिए थी। इस बिल में कई तरह की कमियां हैं। जिसने तलाक़ दे दिया वो शोहर तो तीन साल के लिए जेल चला जायेगा। लेकिन उसकी पीछे उसकी बीवी और बच्चों की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। और अगर उनके बच्चे छोटे-छोटे हुए तो फिर यह और भी बड़ी मुसीबत बन जाएगी।

तीन तलाक का समर्थन नहीं यह बुरा है

मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हम वाकई में खुद तीन तलाक का समर्थन नहीं करते यह बुरा है और गुनाह भी है तलाक़ किस ध’र्म के लोगों में नहीं होते। तलाक़ हो गया लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसके पति को 3 साल के लिए जेल भेज दो और उन तीन साल के दौरान उसके बीवी और बच्चों को यतीम की ज़िंदगी जीने के लिए बेसहारा छोड़ दो।

जब तक वो जेल में रहेगा उसका घर कौन चलाएगा? और कौन उनकी जिम्मेदारियों को 3 साल तक के लंबे समय के लिए पूरा करेगा? या तो मजबूरी में उस महिला को मदद के बदले खुद को किसी के आगे समर्पित करना पड़ेगा या फिर जहन्नम जैसी ज़िंदगी जीने के लिए समझोता करना होगा यह निहायती बेवकूफी भरी एक बड़ी साजिश है जो मुसलमा’नों के खिलाफ की गई है।

अब तो मुस्लि’म समाज को चाहिए की उनके दिल में अगर ज़रा भी खुदा का खौफ है तो अपनी बेटियों को जायदाद में बराबरी हिस्सा दें। हालांकी देश के बहुत से मुसलमान इस पर अमल भी कर रहे हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि जब इस बात को लेकर कभी झगड़ा उठेगा तो होगा ये कि फलां आदमी फ़िज़ूल में कोर्ट कचहरी में मुकदमे करता फिरेगा। लिहाजा इस फैसले पर ध्यान दीजिये।

अगर किसी के घर में इस तरह की नौबत भी आ जाय तो आप खुद अपने घर के अन्दर ही फैसला रजामंदी से कर लें और शरीअत भी येहे कहती है। मशवरे से काम लीजिये चाहे वह आपके घर की ज़मीन जायदाद का मामला हो या फिर तीन तलाक़ का। नहीं तो फिर तुहारी जिंदगी शरीयत के मुताबिक नहीं अदालत के कानून से चलेगी।