सुप्रीम कोर्ट का EVM और VVPAT को लेकर 2019 लोकसभा चुनाव पर आया बड़ा फैसला, अब हर निर्वाचन खतरे में?

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा चुनाव में ईवीएम हेराफेरी की आशंका को देखते हुए विपक्षी दलों के 21 नेताओं द्वारा दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आगामी लोकसभा चुनावों में चुनाव प्रक्रिया के प्रति मतदाताओं का भरोसा बेहतर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को आदेश दिया है।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने हर विधानसभा क्षेत्र में एक की बजाय पांच बूथों पर ईवीएम और वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) के मिलान करने का निर्देश दिया है। इन्हें रैंडम बेतरतीब तरीके से चुना जाएगा।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा, प्रति निर्वाचन क्षेत्र में एक की जगह 5 ईवीएम की वीवीपैट से मिलान करना चुनाव प्रक्रिया में न केवल राजनीतिक दलों को संतुष्ट करना है, बल्कि आम नागरिको को भी संतुष्ट करना है।

सुप्रीम कोर्ट आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई में 21 पार्टियों की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें परिणाम की घोषणा से पहले एक लोकसभा सीट पर 50 फीसदी ईवीएम की वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) से मिलान की मांग की गई थी।

शनिवार को याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई याचिका पर अदालत का यह आदेश आया है. अगर चुनाव आयोग ने पेपर ट्रेल के माध्यम से 50 फीसदी वोटों के मिलान की उनकी मांग को मंजूरी दे दी तो वे लोकसभा चुनाव के नतीजों में पांच दिन की देरी के लिए भी सहमत हैं।

इससे पहले एक हलफनामे में पार्टियों ने कहा था कि अगर यह चुनावी प्रक्रिया की अखंडता को सुनिश्चित करता है तो आम चुनाव के परिणाम घोषित करने में 5.2 दिनों की देरी भी ज्यादा नहीं है. उन्होंने कहा था कि मतदान निकाय में लोगों की संख्या न बढ़ाने पर ही देरी से दिक्कत होगी।

पार्टियों का कहना था कि अगर जनशक्ति बढ़ाई जाती है, तो भी एक दिन में भी गिनती पूरी की जा सकती है, भले ही 50 प्रतिशत ईवीएम पेपर ट्रेल्स से सत्यापित की जाएं. हम चुनाव आयोग पर कोई रोक नहीं लगा रहे हैं, हम केवल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया चाहते हैं।

यह हलफनामा ‘इलेक्शन वाचडॉग’ के रुख के जवाब में दिया गया था. चुनाव आयोग ने एक हलफनामे में यह भी कहा था कि वह कम से कम छह दिनों तक परिणामों की घोषणा में देरी कर सकता है. चुनाव आयोग के प्रावधान के अनुसार प्रति निर्वाचन क्षेत्र में केवल एक ईवीएम की वीवीपीएटी पेपर-स्लिप से मिलान की अनुमति थी।

नायडू के अलावा याचिकाकर्ताओं में केसी वेणुगोपाल (कांग्रेस), अरविंद केजरीवाल (आप), अखिलेश यादव (एसपी ), शरद पवार (एनसीपी), डेरेक ओ ब्रायन (टीएमसी), फारूक अब्दुल्ला (नेशनल कांफ्रेंस) और दानिश अली (जेडीएस) शामिल थे।

वहीं मामले में कांग्रेस पार्टी ने सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया कि भारत का चुनाव आयोग अपने निर्देश पर पुनर्विचार करे. कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, ‘हम एक विधानसभा क्षेत्र में वीवीपीएटी स्लिप के प्रति पांच बूथ सत्यापन से संतुष्ट नहीं हैं. अगर वीवीपीएटी स्लिप सत्यापित नहीं हैं, तो 18,200,00,000 रुपये खर्च करने का क्या मतलब है?

वही सुरजेवाला ने कहा हमने 50 फीसदी वीवीपीएटी पर्चियों के सत्यापन की मांग की थी. उच्चतम न्यायालय का आदेश उचित नहीं है. शीर्ष अदालत को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।