अगर में नहीं मानता तो वो मेरा एनकाउंटर कर देते

गुजरात की अहमदाबाद सेंट्रल जेल के बाहर बड़ी तादात में भीड़ थी मानों कोई मेला लगा हो. लेकिन यह हुजूम किसी मेले में नही बल्कि जेल से रिहा हो रहे मुफ़्ती अब्दुल कयूम का स्वागत करने के लिए इकठ्ठा हुआ था. कयूम को जेल से दरिपुर में स्थित अपने घर तक का सफर तय करने में तीन घंटे लग गए जबकि यह दुरी सिर्फ दस किलोमीटर थी इससे ही वहां मौजूद लोगों के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है. कयूम को एक गहरी साजिश के तहत फंसाया गया था यही वजह थी कि उनके बाहर आने का लोगों को इंतजार था.

मुफ़्ती अब्दुल कयूम को एक राजनीतिक साजिश का शिकार बनाया गया और उन्हें निर्दोष होते हुए भी 11 साल जेल में बिताने पड़े. कयूम पर अक्षरधाम मंदिर पर हमले का आरोप लगाया गया था इससे पहले तो उन्हें इस मामले में मौ$त की सज़ा तक सुना दी गई थी.

mufti abdul

लेकिन कई सालों की सुनवाई के बाद उन्हें बेकसूर क़रार दिया गया है. क़यूम के दोस्त सलाम शेख कहते हैं कि उसकी रिहाई वाले दिन अहमदाबाद के पुराने शहर बिस्तर में सैकड़ों किलो मिठाई बंटी गई थी. कयूम को 15 अगस्त 2003 के आज़ादी के 56वें वर्ष के जश्न के दो दिनों बाद पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

अहमदाबाद के दरीपुर इलाके की एक मस्जिद में कयूम मुफ्ती थे. मस्जिद में आजादी के दिन उन्होंने तकरीर दी थी कि आज़ाद भारत में मुसलमानों का उतना ही हक है, जितना और किसी का. कयूम के अनुसार उसे 17 अगस्त 2003 को क्राइम ब्रांच में ले जाया गया.

कयूम कहते है कि वहां मुझे हरेन पंड्या मर्डर और फिर अक्षरधाम मंदिर हमले के बारे में बताया गया. फिर मुझ पर 2002 के दं$गों का बदला लेने के लिए फिदायीन को अहमदाबाद में शरण देने और हैदराबाद के कुछ साथियों के साथ मिलकर हमले की जगह तलाशने का आरोप लगाया गया.

क़यूम कहते हैं कि उन्होंने मुझ गुनाह कबूल करने के लिए कहा और मेरे इनकार करने पर मेरी उंगलियों में करंट लगाया गया मुझे बेड़ियों से बांधकर डंडों से पिटा गया. वो रोज मुझे मारते थे मैं बेहोश होता उठता और फिर बेहोश जो जाता.

उन्होंने बताया कि एक दिन रात के समय मुझे कहीं ले जाया गया देखकर अहमदाबाद एयरपोर्ट के पीछे का हिस्सा लग रहा था. उन्होंने मुझ से कहा कि ये कोतरपुर है तेरे लतीफ़ को भी हमने यहीं मारा था. इसके बाद उन्होंने मेरे आसपास पांच गोलियां चलाई मुझे लगा अगर मैंने गुनाह कबूल नहीं किया तो यहीं मेरा एनकाउंटर हो जाएगा.

बता दें कि अब्दुल लतीफ एक कुख्यात गैंगस्टर था. जिसका एनकाउंटर यहीं पर किया गया था. और यही वो जगह है जहां 2004 में इशरत जहां और उसके तीन दोस्तों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मा$र दिया गया था.

कयूम कहते है कि हम सिस्टम से नराज़ हो सकते है लेकिन यह हम भी मुल्क के उतने ही है जिनते हिन्दू. कौम के मुट्ठीभर लोगों द्वारा कि गलत हरकत के लिए सबको जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते. उन्होंने बताया कि जेल में 11 साल बहुत खराब बीते कई बार आत्म$हत्या करने का भी ख्याल आया.

mufti abdul kayum

लेकिन उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट हमें जरुर न्याय देगा. उन्होंने बताया कि क्राइम ब्रांज ने पुरे केस में सबूत के तौर पर सिर्फ दो चिट्ठियां पेश की थी और कहा था कि यह मैंने फिदायीन को लिखाकर दी थी जिसने अक्षरधाम पर हमला किया था.

लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने फिदायीन की पैंट और पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट देखकर पूछा कि इनकी ला$शें खून और मिट्टी में लथपथ हैं और पैर में इतनी गोलियां लगीं हुई हैं लेकिन चिट्ठियों पर खून का एक कतरा तक नहीं ऐसा क्यों? इसके बाद कानून ने हमें बेगुनाह साबित कर दिया.

वह आगे कहते है कि लेकिन 11 सालों का हिसाब कौन देगा जो मैंने जेल में बिताए जब मुझे फांसी सुनाई गई थी तो अख़बार में बड़े बड़े फोटो छपे लेकिन जब मुझे रिहा किया गया तो कुछ ही अख़बारों और चैनलों ने यह ख़बर दिखाई.