साध्वी प्रज्ञा से लेकर मोदी तक कई बड़े नेता RSS से जुड़े हैं जानिए आज़ादी की लड़ाई में क्या हैं RSS का योगदान

भले ही मौजूदा दौर की कोई राजनीतिक पार्टी क्विट इंडिया मूवमेंट का हिस्सा रही हो या न रही हो, उसकी विरासत तो सभी ने गंवा दी है. जहां तक संघ परिवार का सवाल है, आज़ादी की लड़ाई में उनकी कोई भूमिका नहीं थी. आजादी से पहले ही कांग्रेस का गठन हुआ, जिसने आजादी की लड़ाई में अपनी अहम भूमिका तो निभाई साथ ही वो देश के सबसे पुराने संगठनों में भी शुमार है।

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जो अब तक अस्तित्व में हैं। ऐसा ही एक संगठन है आरएसएस जिसकी स्थापना आजादी से करीब 25 साल पहले हुई। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आजादी की लड़ाई में RSSका क्या योगदान रहा था।

आरएसएस की स्थापना 1925 में की गई। तब आजादी का आन्दोलन जोरों पर था। गांधी आज़ादी की लड़ाई की बागडोर अपने हाथ में ले चुके थे और गांधी के नेतृत्व में 1921 का असहयोग आन्दोलन असफल हो गया था। देश का युवा, बुजुर्ग और बच्चे सभी की रगों में देश को आजाद कराने का जज्बा भरा हुआ था।

शम्सुल इस्लाम अपनी किताब ‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइंड – ए क्रिटिक’ में कहते हैं कि ‘संघ का ऐसा एक भी प्रकाशन या दस्तावेज़ नहीं है जो भारत छोड़ो आंदोलन या उस समय चल रही आज़ादी की लड़ाई में संघ द्वारा किये गये अप्रत्यक्ष कामों पर कुछ प्रकाश डाल सके।

एक संगठन के तौर पर संघ ने ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ या दमित भारतीय जनता के अधिकारों के लिये कोई संघर्ष नहीं छेड़ा, न ही संघ का उच्च नेतृत्व कभी भी आज़ादी की लड़ाई का हिस्सा रहा।

शम्सुल इस्लाम लिखते हैं कि गोलवरकर और संघ विदेशी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी आंदोलन के प्रति अपना विरोध छिपा पाने में कभी भी सफल नहीं हुए। यहां तक कि मार्च 1947 में भी जब ब्रिटिश शासक भारत छोड़कर चले जाने का फैसला कर चुके थे तब दिल्ली में संघ के वार्षिक दिवस समारोह को संबोधित करते हुए गोलवलकर ने कहा कि संकुचित दृष्टि वाले नेता ब्रिटिश राज्यसत्ता के विरोध का प्रयास कर रहे हैं।

इस बिन्दु को और विस्तारित करते हुए उन्होंने कहा कि देश की बुराईयों के लिये शक्तिशाली विदेशियों को दोषी ठहराना उचित नहीं। आरएसएस के संस्थापक डॉ हेडगेवार कहते थे कि ‘अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद भी जब तक हिन्दू संगठित नहीं होंगे, क्या गारंटी है कि हम अपनी आजादी की रक्षा कर सकेंगे।

रिसर्च के दौरान एक जगह यह मिलता है कि हेडगेवार और उनके साथियों ने 1912 में गोवा पोर्ट पर भी अंग्रेजों के हथियारों को लूटने का प्लान बनाया लेकिन अंग्रेजी सरकार को क्रांतकारियों की योजना की भनक लग गयी और उन्होंने गोवा पहुंचने से पहले ही जहाज को रोक दिया।

डॉ हेडगेवार शुरुआत में कांग्रेस से जुड़े और गांधी की अगुवाई के चल रहे 1921 के असहयोग आन्दोलन में भाग लिया और और जेल चले गए, 12 जुलाई 1922 को वे जेल से रिहा हुए। बाद में गांधी के खिलाफत आन्दोलन में सहयोग से नाराज़ होकर कांग्रेस छोड़ दी।

महात्मा गांधी जब दलितों के अधिकार की लड़ाई हो या महिलाओं की अधिकार सबको किनारे कर देश की आजादी को मुख्य मुद्दा बनाकर चल रहे थे। गांधी अम्बेडकर से भी कहते कि हम दलित लोगों की लड़ाई आजादी हासिल करने के बाद करेंगे वहीं आरएसएस के गुरु गोलवरकर शुरू से ही देश भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में विकसित करना चाहते थे।

वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र नाथ बरतरिया बीबीसी हिंदी पर लिखे अपने लेख ‘भारत में आरएसएस के 10 योगदान’ में भी एक भी योगदान आजादी से पहले का नहीं गिनाते। आजादी के बाद किसी भी तरह की समस्या आई हो उसमें तो आरएसएस ने बहुत मेहनत से काम किया। लेकिन आजादी की लड़ाई में आरएसएस के किसी एक भी बड़े नेता का अहम योगदान नहीं दिखता है।

तिरंगे की जगह भगवा झंडा

जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी मामले के बाद देश में हरेक यूनिवर्सिटी में झंडा लगाने का फरमान जारी किया गया, लेकिन 2001 में आरएसएस मुख्यालय नागपुर में तिरंगा फहराने के कारण राष्ट्रप्रेमी युवा दल के उत्तम मेंढे, विजय रमेश कलंबे और दिलीप छततानी पर मामले दर्ज कराकर जेल भिजवाया था।

पिछले दिनों जब यह मामला उठा तो संघ ने इस मामले पर सफाई देते हुए अपने फेसबुक पेज पर लिखा कि ‘भगवा ध्वज का निर्माण संघ ने नहीं किया है और न ही उसका इरादा कोई अलग झंडा बनाने का है। संघ ने भगवा ध्वज इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि यह हजारों सालों से राष्ट्र धर्म का प्रतीक रहा है।

देश तब अंग्रेजों का गुलाम था। लेकिन तब आरएसएस की स्थापना देश आजाद कराने के मकसद से नहीं बल्कि हिन्दुओं की रक्षा के लिए की गई। गीतकार जावेद अख्तर एक इंटरव्यू में कहा था।

Courtesy :navodayatimes

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