बदले की आग में धधक रहा अमेरिका और ईरान, जानिए कौन है दोनों देशो में सबसे ज़्यादा शक्तिशाली?

दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी कम होने का नाम नहीं ले रहा है। अमेरिकी हवाई ह’मले में ईरान के कमांडर कासिम सुलेमानी की मौ’त हो जाने के बाद पूरी दुनिया यु’द्ध के मुहाने पर पहुंच गई है। ईरान ने अपने यहां मस्जिदों पर लाल झंडा फहराकर यु’द्ध के संकेत देने के साथ हीं मंगलवार रात व बुधवार की सुबह इराक में स्थित दो सैन्य अड्डों को न’ष्ट कर दिया है।

वहीं अमेरिका ने कहा कि अगर ईरान किसी भी अमेरिकी नागरिक और संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसके परिणाम बेहद ही ख’तरना’क हो सकते हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक बयान में कहा कि ईरान अगर कोई भी अमेरिका के खिलाफ कदम उठाता है तो उसके 52 प्रमुख ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा। क्योंकि ईरान ने काफी साल पहले 52 अमेरिकी नागरिक को बंधक बना लिया था।

ईरान और अमेरिका दोनों देश का आंकलन किया जाए तो कोई भी देश पीछे हटने वालों में से नहीं है। आनेवाले दिनों में दोनों देशों के बीच कभी भी यु’द्ध जैसे माहौल बन सकते हैं। यहां पर सवाल यह है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच यु’द्ध होता है तो कौन सा देश किसके साथ होंगे। हालांकि दुनिया भर के देश यही चाहता है कि दोनों देशों के बीच शांति हो जाए। ऐसी कोई नौबत ही ना आए जिससे इंसानी जिंदगी को नुकसान पहुंचे।

हालांकि अमेरिका के साथ यु’द्ध करने के लिए ईरान के पास इतनी ताकत नहीं है कि वो उससे सीधी तरिके से यु’द्ध लड़ सके। सीधे यु’द्ध में उसे किसी देश का साथ भी नहीं मिलने वाला है। लेकिन लेबनान, यमन, सीरिया, फिलिस्तीन और इराक का साथ तब मिल सकता है जब ईरान अमेरिका के खिलाफ छ’द्म य’द्ध करे। मतलब सीधे यु’द्ध ना करके तीसरी शक्ति का इस्तेमाल करके अमेरिका को नुकसान पहुंचाया जाए।

अमेरिका के द्वारा मेजर सुलेमानी की जिस तरह से ह#त्या की गई उसकी आलोचना रूस और चीन दोनों देश कर चुके है। इससे ये जाहिर होता है कि ईरान अगर यु’द्ध करता है तो उसे रूस और चीन का साथ मिल सकता है। वहीं चीन ने सीधे तौर पर तो अमेरिका को कुछ कहा नहीं है। लेकिन चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने कहा कि बीजिंग इस मामले पर चिंतित है और वो लगातार मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव पर नजर बनाए हुए है।

वही रूस ने इस कार्रवाई को अवैध कार्रवाई बताया है। वैसे भी पूरी दुनिया को पता है कि चीन और रूस का अमेरिका से छ’त्ती’स का आंकड़ा है। भले ही वो सीधे ईरान के साथ ना हो, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से ईरान की मदद कर सकते हैं। अगर हम सीधे यु’द्ध की बात करे तो निश्चित तौर पर ईरान के साथ रूस और चीन जा सकता है। क्योंकि मीडिल ईस्ट से रूस और चीन दोनों के अपने-अपने फायदे जुड़े हैं।

अगर बात करें की अमेरिका ईरान के खिलाफ जं’ग का ऐलान करता है तो उसके साथ सऊदी अरब, इजरायल और खाड़ी देश का समर्थन मिल सकता है। फिलहाल ये देश भी दोनों को संयम बनाए रखने की बात कह रहे हैं।

शुरूआत से ही इजरायल और सऊदी अरब ईरान को अपना जानी दुश्मन मानते हैं। ऐसे में वो अमेरिका के साथ खड़े नजर आएंगे। ईरान और लेबनान के आ’तंकवा’दी संगठन हिजबु’ल्ला य’हू’दी बाहुल्य देश इजराइल से नफरत करते हैं। दोनों देशों के बीच कई बार यु’द्ध जैसे हालात बन चुके हैं।

वहीं सऊदी अरब और ईरान के बीच शिया-सुन्नी वाली लड़ा’ई है। ईरान में ज़्यादातर शिया मुसलमा’न हैं, वहीं सऊदी अरब ख़ुद को एक सुन्नी मुस्लि’म शक्ति की तरह देखता है। दशकों से खुद को मुस्लि’म दुनिया का नेता मानने वाले सऊदी अरब को साल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के द्वारा चैलेंज किया। जो कि सऊदी अरब को पसंद नहीं आया और दोनों देश ने अपने बीच दूरियां बढ़ा गई थी।

अगर हम फ्रांस और इंग्लैंड की बात करे तो इनका साथ भी अमेरिका को मिल सकता है। हालांकि दोनों देशों के तनातनी को लेकर यूरोपीय संघ अमन और शांति बहाली की अपील की है। सच्चाई यही है कि ईरान अगर यु’द्ध छेड़ता है तो उसका हारना तय है।

क्योकि अमेरिका के सैनिकों और ह’थिया’रों के आगे ईरान बेहद ही बौना है। लेकिन बावजूद अमेरिका को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके साथ ही साथ पूरी दुनिया भी इस आ’ग में झुलस सकती है।