यूपी मुस्लिम वोट बैंक: इस चुनावी मंडी में मुसलमानों का क्या है मोल?

लोकसभा चुनाव सिर पर आ चूका है ऐसे में कई मुद्दों पर और कई बातों पर चर्चा होने लगी है. राजनीतिक पार्टियों भी कई तरह के वादे और वचनों के साथ अपने वोटरों को एक करने में जुटे हुए है. ऐसे में सबकी नजर जिस पर है वो है यूपी के मुस्लिम वोटर. कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर आता है, क्योंकि यूपी में सबसे ज्यादा सीटें है. यूपी में मुस्लिमों के वोट के लिए बड़ी उठापटक होती है और हो भी क्यों नहीं? आख़िर यूपी की आबादी में क़रीब 20 फ़ीसदी हिस्सा मुसलमानों का जो है.

एक ज़माने में नरसिम्हा राव की सरकार में रेल मंत्री रहे सीके जाफ़र शरीफ़ ने कहा था कि मुसलमान को मंडी के माल की तरह लिया जाता है. मुसलमानों के वोट के बारे में ऐसा माना भी जाता है और हल्के ढंग से आमतौर पर कहा भी जाता है कि ये ‘क्टिकल वोटिंग करते हैं, एकतरफ़ा चले जाते हैं.

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लेकिन 2014 में पहली बार लगा कि मुसलमान न मंडी का माल है और न उसका कोई लेने वाला है. यूपी के 4 करोड़ मुसलमान एक सांसद भी संसद को नहीं दे सके. मोदी लहर की बाढ़ में केवल मुसलमानों के नेताओं की राजनीति ही नहीं, सारी जमी-जमाई थियरी भी बह गई.

2014 के लोकसभा चुनाव से यूपी में दो नतीजे निकल कर सामने आए. पहला मुसलमान इकतरफ़ा थोक वोट बैंक नहीं है और दूसरा वो भी उतना ही बंटा हुआ है जितना यूपी के अन्य वोटर समूह बंटे हुए है. 2011 की जनगणना के अनुसार यूपी में 4 करोड़ मुसलमान हैं तो वहीं देशभर में 18 करोड़ यानी 14 फ़ीसदी है. लेकिन 2014 में सबसे कम सिर्फ़ 22 मुसलमान लोकसभा पहुंचे.

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इस गणित को रामपुर सीट से समझते है. यहां पर मुस्लिमों की आबादी 49.14% है लेकिन इसके बाद भी यहां से किसी मुस्लिम कैंडिडेट को २०१४ में जीत नहीं मिल सकी थी. बीजेपी के नेपाल सिंह ने सपा के नसीर अहमद खान को करीब 28 हज़ार वोटों से हरा दिया था. इस सीट से बीजेपी के आलावा सभी पार्टियों ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे.

सपा के नवाब काजिम अली खान ने डेढ़ लाख वोट हासिल किए, बसपा के अकबर हुसैन ने 81 हज़ार वोट और ऑल इंडिया माइनोरिटी फ्रंट की कैंडिडेट जन्नत निशाँ को पांच हज़ार वोट मिले. नतीजा बीजेपी उम्मीदवार ने जीत दर्ज कर ली. खुद को मुस्लिमों का हितैषी कहने वाली पार्टियों में ही मुस्लीम वोट बांट गए जिसके चलते इस सीट से मुस्लिम उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं कर सका और ऐसा ही लगभग सभी मुस्लिम बहुल सीट पर हुआ.

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2014 के लोकसभा चुनावों ने यह बात साफ कर दी कि सभी मुसलमान सिर्फ़ बीजेपी विरोध के आधार पर वोटिंग नहीं करते है. मुस्लिम समाज को इस खांचे में फिट करना असल में गैर बीजेपी पार्टियों की एक सहूलियत है जिसके सहारे वो उनके मुद्दे और अंतर्विरोधों से मुंह फेर लेते है. ऐसा करके उन्हें वोट बैंक में बदलना आसान हो जाता है.

साभार- न्यूज़18